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मानवआज सुबह कुछ बदली सी है। थोड़ी-थोड़ी गर्मी और उमस का एहसास हो रहा है। मोरों की म्याँऽ-म्याँऽ और कोयल की कुऊ-कुऊ भी कुछ अधिक तीव्र और अधीर लगती है। तीतर का एक जोड़ा मेरे सामने चर रहा है। शायद आज वर्षा होने वाली है।मैं इन पक्षियों की अधीरता को अब पहचानने लगा हूँ। म्-म्-म्-म्याँऽ-म्याँऽ-म्याँऽ स्वर-संगम मोर की अधीरता का परिचायक है। जबकि कोयल क्-क्-क्-कुऊ-कुऊ-कुऊ से अपनी अधीरता प्रकट करती है। चारों तरफ से बस इन्हीं पक्षियों की आवाज़ें आ रही थीं। बीच-बीच में मैनों की चूँऽ-चूँऽ-चुक-चुक भी सुनाई पड़ जाती थी। इक्का-दुक्का तोते भी सर के ऊपर से टाँय-टाँय करते गुज़र जाते थे। तीतर भी पत्थरों के बीच से कीड़े-मकोड़ों का भक्षण करते पिट-पिट-हाँ-पिट-पिट-हाँ की तेज़ आवाज़ निकाल उठते थे। इन सभी पक्षियों की अधीरता, उत्साह और कौतुहल इस बात की शहादत दे रहे हैं कि पानी अब दूर नहीं है। मैनों का एक जोड़ा मेरे पास आया और सूखे तिनकों को चुनने में व्यस्त हो गया। शायद पानी आने से पहले घर की समस्या से छुटकारा पा लेना चाहते हों। सफेद और नीले रंग की तितलियाँ रंग-बिरंगी काग़ज़ी फूलों की लताओं से खेल रही थीं। हवा के झोकों के साथ फूलों की सूखी पत्तियाँ ज़मीन पर इस तरह गिर आतीं मानों अपना कार्य समाप्त कर गर्व से प्राण त्याग रही हों। एक छोटी सी काली चिड़िया फुदकती हुई वहाँ आ निकली। इससे पहले कि यह सवाल मेरे दिमाग़ में आता कि इसका जोड़ा कहाँ है, एक- दो कीट पतंगों को अपने चोंच में उठा वह उड़ चली और सामने अमलतास के पेड़ पर जा कर अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को खिलाने लगी। मैं वहाँ से उठा और अपने घर की तरफ कुछ यूँ चल पड़ा जैसे पानी की ज़रूरत जिन्हें हो, वह उसके स्वागत में गीत गाएं। मुझे क्या, मैं तो मानव हूँ। |
हुर-हुर साँप और उसका छाताबरसात शुरू हुई नहीं कि हुर-हुर साँप अपने छातों के साथ खेत की क्यारियों, बाग़ीचों और फुलवारियों में हाज़िर। तदाद इतनी कि निडर हुए बिना गुज़ारा नहीं। सावन और भादो में इनकी तादाद बहुत हो जाती है। इतनी कि लोगों को इस बात पर सोचने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है कि आख़िर यह आते कहाँ से हैं। इनका रंग खेतों में लगे धान जैसा ही हरा-पीला होता है। लम्बाई एक हाथ के क़रीब। एक उंगली के क़रीब मोटे। कहां से आते हैं यह ? अभी एक भी नहीं, पानी पड़ा और यह देखो चार इधर से, दो उधर से, एक यहाँ पर। बच्चे पूछते हैं, यह सब कहाँ से आते हैं। सब का एक ही उत्तर रहता है, यह पानी के साथ-साथ बरसते हैं। पानी बरसना रुका नहीं कि देखिए ये आपको दो-दो, चार-चार, पाँच-पाँच के झुंड में नज़र आ जाएंगे। इनका नाम भी लोगों ने हुर-हुर शायद इसी लिए दिया है कि यह बरसात में जहाँ देखो वहाँ हुरहुराते नज़र आते हैं। या फिर शायद इनका हरा रंग ही इनके नाम का कारण हो। ये ज़हरीले नहीं होते और गाँव के लोगों और किसानों को इनसे ज़रा भी भय नहीं लगता। केवल बच्चे इन्हें देख थोड़े विचलित अवश्य हो जाते हैं।इनके साथ ही अगर कोई वस्तु बरसात में इन्हीं की तरह अचानक नज़र आती है तो वह है इनका छाता। जहाँ देखो खेतों, क्यारियों और घासों में सफेद-सफेद छोटे-छोटे छाते नज़र आने लगते हैं। लोग इसे साँप का छाता भी कहते हैं। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि ये साँप इन छोटे-छोटे छातों में अपने को पानी से कैसे बचाते हैं। और शायद यह तर्क का विषय भी नहीं। इन छातों में कुछ छाते विषैले होते हैं और जिसे खा कर मनुष्य मर भी जाते हैं। चूंकि विष साँप की अभिन्न विशेषता है, इसलिए लोग कहते हैं कि साँप अपना कुछ विष इन्हीं छातों में छोड़ देते हैं। गाँव के लोगों के लिए तो बस इतना ही काफी है कि हुर-हुर अपना छाता लिए बरसात में आते हैं और बरसात समाप्त होते ही चले जाते हैं। |
तारेटिम-टिम टिम-टिम करते तारे;झिल-मिल झिल-मिल करते सारे। सूरज की किरणों से हैं शरमाते; रात ढ़ले निकल घर से सब आते। गुम-सुम गुम-सुम लगते न्यारे; कुम-कुम कुम-कुम करते प्यारे। छोटे-छोटे आस्माँ में उड़ते जाते; नन्हें-नन्हें, खिलखिलाते, मुस्कुराते। आपस में लड़ते ना कभी टकराते: अपनी-अपनी धुन में बढ़ते जाते। सब की आँखों में शीतलता बरसाते; छोटे-बड़े सब, नज़रों को कितने भाते। टिम-टिम टिम-टिम करते तारे; झिल-मिल झिल-मिल करते सारे। |
जंगलीमैं आज फिर उसी पत्थर पर बैठा था। सामने दो पिपल और तीन-चार नीम के बड़े-बड़े पेड़ थे। हवा चल रही थी। और मैं किसी सोच में गुम हवा का आन्नद ले रहा था। एक सुनहरे रंग की पालतू बिल्ली, जिसे गाँव के लोग काफी मानते थे और दूध, खीर और हड्डियाँ उसे सौंपते रहते थे, उधर आ निकली। वह अपने पंजों पर कुछ इस तरह धीरे- धीरे चल रही थी जैसे किसी की घात में हो। उसकी सावधानी देखने लाएक थी। वह जब अपने पंजे सूखे पत्तों पर रखती तो खड़-खड़ाहट की आवाज़ तक न होती थी। मैं भी चुपचाप बैठा यह देखने लगा कि आख़िर ये पालतू बिल्ली किसकी घात लगाए है।अचानक एक दुबली-पतली बिल्ली जिसका रंग मटियाला भूरा था, झाड़ी से अपने खाने की तलाश में निकली। बड़ी स्वच्छंद, निर्भीक, किसी भी तरह की आशंका से मुक्त, इधर-उधर नज़र दौड़ाते हुए घूमने लगी। उसने एक नज़र मेरी तरफ देखा और उस पालतू बिल्ली की तरफ भी, किन्तु ऐसे जैसे उसे हम दोनों से कोई लेना-देना न हो। फिर झाड़ियों में इधर-उधर ताकने लगी। उसका यह भाव इस बात का द्योतक मालूम पड़ता था जैसे उसे मानव और मानव संबंधी समाज से किसी प्रकार का भय हो न रंज और न कोई ख़ास लेना- देना। अपने जीवन शैली से संतुष्ट। इधर-उधर टहलने लगी कि शायद कुछ मिल जाए। पालतू बिल्ली जो अब बिलकुल तैयार हो चुकी थी, ने अचानक एक ज़ोरदार छलाँग लगाई और अपने और जंगली बिल्ली के बीच फासले को ख़त्म कर उसपर झपट पड़ी। जंगली बिल्ली इस अचानक हमले से ज़मीन पर ढ़ेर हो गई। पालतू बिल्ली ने उसे धर दबोचा। जंगली बिल्ली को पालतू बिल्ली के पंजों से छूटने में काफी मेहनत करनी पड़ी। ख़ैर जैसे ही वह छूटी, बगल की एक नीम पर सरसरा कर इतनी तेज़ी से चढ़ गई कि मैं सोच भी न सका। बीस- पचीस फीट की ऊँचाई पर जा कर कुछ इस तरह एक डाल पर छुप बैठी जिससे कि पालतू बिल्ली फिर उसे देख न ले। पालतू बिल्ली ने दो-चार बार पेड़ पर चढ़ने का प्रयास किया, किन्तु दो-तीन फीट से अधिक न चढ़ पाई। वह वहीं पेड़ के नीचे घूमने लगी और जंगली बिल्ली अपनी साँस रोके नीम के पेड़ की डाल पर उसी तरह बैठी रही। जब काफी देर हो गई तो मैं वहाँ से उठा और एक पत्थर मार कर पालतू बिल्ली को वहाँ से भगाया और स्वयं भी यह सोचता हुआ चल पड़ा कि - जंगली कौन है ? |
कौआकौआ है तो काँव-काँव करता है।मदमस्त है, कुछ भी रटता रहता है॥ फिक्र नहीं, अच्छा- बुरा सब कहता है। अन्याय भाता नहीं, काँव-काँव करता है॥ कोई भी नज़र आता जो मुसीबत में। उड़ता हृदय-विहल् काँव- काँव रटता है॥ काला है पर तेज है, पंख चमकता है। प्रहरी प्राणी जगत् का, सवेरे जगता है॥ आओ ज़रा सुने उसकी भी आवाज़ को। आज फिर कौआ काँव-काँव करता है॥ |
रानी मक्खीकेहरा, पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव था। गाँव के चारों तरफ बस जंगल ही जंगल। जंगल जंगली फूलों से भरे थे। गाँव के बीचों-बीच गाँव के सरपंच का घर था। घर के ठीक सामने ही बरगद का एक अत्यंत ही प्राचीन पेड़ था। न जाने कितने ही प्राणी उस बरगद के पेड़ पर रहा करते थे। किन्तु इधर कुछ दिनों से उसपर मकड़ियों का प्रकोप था। जिधर देखो मकड़ियाँ अपना जाल बना कर कीट-पतंगों को अपना शिकार बनाती रहती थीं। कोई अनजाने में उनमें फंस जाता, तो किसी से दोस्ती कर ये मकड़ियाँ उसे अपने जाल में फंसा लेती थीं। पेड़ पर मधु-मक्खियों ने भी अपना छत्ता लगा रखा था। छ्त्ते के चारों तरफ मकड़ियों ने अपना जाल बना छोड़ा था। आते-जाते मधु- मक्खियाँ उनमें फंस जातीं और अपनी जान गवाँ बैठती थीं। मधु- मक्खियों के लिए ये बड़ी चिन्ता का कारण था। उधर मकड़ियों को मधु-मक्खियों के शिकार में बड़ा मज़ा आता था। रानी मक्खी ने आख़िर तंग आ कर बैठक बुलाई और फैसला हुआ कि वे अब स्थान बदल देंगी। उन्होंने गाँव के बाहर के पीपल के पेड़ पर अपना छत्ता बना कर शहद ले जाने का फैसला किया। पर रानी मक्खी ने अपने सैकड़ो बन्धुओं की मौत का बदला लेने की भी ठान रखी थी। सभी मक्खियों ने रानी मक्खी की राय मान ली और गाँव के बाहर वाले पेड़ पर छत्ता बना लिया और अपना शहद भी वहाँ ले गईं।अब रानी मक्खी जब कभी गाँव के पीपल के पास से गुज़रती, उसके नीचे खेलते हुए बच्चों में से किसी एक को काट उड़ जाती। सारे गाँव में हल्ला-कोहराम मच जाता। बच्चों के माता- पिता परेशान रहने लगे। एक दिन रानी मक्खी ने सरपंच के बच्चे को काट लिया। सरपंच बड़ा क्रुद्ध हुआ। उसने अपने लोगों से कहा कि वह आग की लुआठी ले पेड़ पर चढ़ जाएँ और छत्तों को आग और धूआँ दिखा सारा मधू उतार लाएँ। आज्ञा पाते ही कई लोग आग की लुआठी लिए पेड़ पर चढ़ गए। आग की लपट से मकड़ियाँ और उनके बनाए जाल जल-जल कर गिरने लगे। लोगों ने छत्तों को आग दिखाई तो छत्ते भी धू-धू कर जल उठे। सारे छत्ते पहले से ही सूखे थे। मधू तो उनमें था ही नहीं। केवल मोम बचा था। लुआठी और छ्त्तों की लपटों और धूओं से सारी की सारी मकड़ियाँ और उनके बनाए जाल जल गिरे। इस प्रकार रानी मक्खी ने अपने बन्धुओं का बदला मकड़ियों से ले लिया। |
ठंडी हवाऐ ठंडी हवा,तू कहाँ से आएऽऽऽऽऽऽ। गुल से मिल, गुलशन महकाएऽऽऽ। धान के खेतों में, मोरों के पंखों में, पेड़ों की छाँव में तू गाएऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। ऐ ठंडी हवा,-----------। संगीत के साज़ों पे, तबले की थापों पे, तिरंगे के रंगों पे तू लहराएऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। ऐ ठंडी हवा,-----------। सागर के लहरों में, उपवन के झरनों में, आज़ादी के सपनों में तू शोर मचाएऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। ऐ ठंडी हवा,-----------। दिल के उमंगों में, आशा के किरणों में, ख़ुशी के लहरों में तू समाएऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। ऐ ठंडी हवा,-----------। |
नीम का पेड़एक पीली बिरनी ने नीम के एक पेड़ की डाल पर अपना खोता लगा रखा था। आज सवेरे से वह अपने खोते में पड़ी-पड़ी कराह रही थी। चंचल काला चिऊंटा नीम के पेड़ की टहनियों पर इधर-उधर घूम रहा था। वह जब बिरनी के खोते के पास पहुंचा तो बिरनी के कराहने की आवाज़ सुन ठिठक कर रुक गया। बिरनी के घर में झाँकते हुए उसने आवाज़ लगाई, "बिरनी दीदी क्या हुआ? बीमार लगती हो। क्या वैद्य जी को बुला लाऊँ ?" बिरनी ने घर के अन्दर से कराहते हुए उत्तर दिया, "चिऊंटे भैया, क्या बताऊँ। कल शाम पता नहीं क्या खा लिया, पेट में बहुत दर्द है और अब रहा नहीं जाता। पहले तो खाने के लिए मुझे पेड़ों के फल-फूल मिल जाते थे, किन्तु अब पेड़-पौधों की इतनी कमी हो गई है कि मनुष्य के जुठों से काम चलाना पड़ता है।""अरे-रे-रे आप मनुष्यों का भोजन न किया करें। उनमें तेल और नून जैसे पदार्थ बहुत हानिकारक होते हैं। पर आप की बात भी सही है। अब पेड़ पौधों के फल-फूल कहाँ नसीब होते हैं। ज़रा देखिए आसपास के सभी पेड़ों को तो इन मनुष्यों ने काट डाला है। चारों ओर अपनी कार्यशालाएँ खोल रहे हैं, जिनसे ऐसी-ऐसी गैसें निकलती हैं कि इस पेड़ पर रहने वाले सारे प्राणियों को भांति-भांति प्रकार की बिमारियाँ हो रही हैं। वह पृथ्वी जिसपर कभी विचरण करने में कितना मज़ा आता था, अब पेड़ से उतर कर उसपर क़दम रखने से डर लगता है कि कहीं ज़हरीले रिसाव में न फंस जाएँ। घास तो जैसे विलुप्त हो चुके हैं। सारी पृथ्वी कार्यशालाओं से निकलने वाले रासायनों से विषाक्त हो चुकी है। पता नहीं कब हमारा यह नीम का पेड़ भी सूख जाए। इसपर अब उतने कोपल भी नहीं लगते। ऐसे जैसे इसे साँप सुंघ गया हो। इन टहनियों को ही देखो, जब मैं छोटा था उस समय कितनी जानदार लगती थीं। अब सब ठिठुर गई हैं जैसे लकवा मार गया हो। पहले कोपल भी कितने लगते थे। जब चाहा खा लिया। अब ढूंढे मिलते हैं और उसपर भी अब वह मज़ा कहाँ। खैर छोड़िए इन बातों को मैं वैद्य जी को बुला लाता हूँ। वह बगल वाली डाली पर आराम कर रहे होंगे।" इतना कह काले चिऊंटे ने अपनी टाँगों से अपना मुँह साफ किया और बूढे़ वैद्य चिऊंटे को बुलाने चल पड़ा। वह तेज़ी से छोटी-छोटी टहनियों से होता हुआ पेड़ की दुसरी डाल पर जा पहुंचा। वैद्य चिऊंटे का कहीं पता नहीं। बहुत पूछने पर पता चला कि वैद्य जी धथुरे का दूध लाने गए हैं। शायद किसी के लिए औषधी बना रहे होंगे। चिऊंटे ने सोचा चलो पेड़ के नीचे जा कर देखते हैं। वह सरसराता हुआ पेड़ की टहनियों से तनों पर और तनों से पेड़ की जड़ के तरफ बढ़ गया। अभी पेड़ की जड़ के पास पहुंचा ही था कि देखा वैद्य जी बड़ी मुशिकल से पेड़ पर चढ़ रहे हैं। उसने पूछा, "वैद्य जी आप कहाँ चले गए थे?" "क्या बताऊँ बाबू पेड़ के कई प्राणियों को इन दिनों अजीब-अजीब बिमारियाँ हो रही हैं। सोचा धथुरे क दूध मिल जाएगा तो औषधी बना उन्हें ठीक करने का प्रयास करुंगा, किन्तु अब धथुरा कहाँ, अब तो विष ही विष भूमि पर फैला है। देखो मेरे पैर की चमड़ी जल गई। पता नहीं भूमि को क्या हो गया है। पौधे अब कहाँ बचेंगे।" वैध जी ने जवाब दिया। फिर दोनों गहरी सोच में मुँह झुकाए धीरे-धीरे पेड़ पर चढ़ने लगे। |
पलाशपलाश के पत्ते, पलाश के फूल।इक बार जो देखे, न पाए भूल॥ मुकुट है या बनफूल है किसका। अंग-अंग लाल टुह-टुह जिसका॥ रंग दे जंगल, ताज है बन का। आन वतन का, शान चमन का॥ पलाश के पत्ते, पलाश के फूल। इक बार जो देखे, न पाए भूल॥ पत्ते होते मोटे-मोटे, गोल-गोल। खड़-खड़ाते, हवा में डोल- डोल॥ बड़े तोड़ें, बच्चे तोड़ें, बनाएं टोप। थाली-प्याली बना, परोसें भोज॥ पलाश के पत्ते, पलाश के फूल। इक बार जो देखे, न पाए भूल॥ |
चकरी चिड़ियाआते-जाते मेरी मुलाक़ात कुछ अनजाने मित्रों से हो जाती थी। न ठीक से मैं उन्हें जानता था और उनका नाम भी मुझे पता नहीं था। मैं जब कभी भी पत्थर पर बैठता और कुछ सोचने के क्रम में आता, चिड़ियों का एक झुंड मुझे परेशान करता। उनकी आवाज़ मुझे तंग तो नहीं करती, किन्तु मेरा ध्यान अवश्य अपनी ओर खींच लेती थी। ये कौन हैं और हमेशा झुंड में ही क्यों रहती हैं ? कभी इस डाल, कभी उस डाल, चंचलता और कौतुहल की मानो प्रतीक। जब भी आतीं, उनकी चीं-चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ, चीं-चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ की आवाज़ से सारा वातावरण गूँजने लगता था। जिधर से गुज़र जाएँ, चीं-चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ, चीं-चकर्रऽऽ- चकर्रऽऽ। बिलकुल छोटी उड़ान, मुश्किल से पाँच-सात-दस मीटर। सब की सब साथ-साथ, फुर्र- फुर्र उड़ने और बैठने में व्यस्त रहती थीं। ठीक वैसे ही जैसे सूखे पत्तों के ढ़ेर हवा के झोकों के साथ एक दिशा से दूसरी दिशा में उड़ते नज़र आते हैं। कद गरवैया या बगैरी से दुगना होगा। रंग सूखे पत्तों और डालियों की तरह मटमैला। क्या कहूँ इन्हें? एक दिन कुछ सोचा और इनका नाम चकरी चिड़िया रख दिया। मैं इनके बारे में लिख रहा हूँ और उनमें से एक मेरे सामने आ कर चीं- चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ, चीं-चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ मचा रही है। चकरी चिड़िया का एक साथ-साथ रहना मुझे अच्छा लगने लगा था। ये फुदकती भी काफी हैं। इनकी चीं- चकर्रऽऽ-चकर्रऽऽ की आवाज़ और इनका तेज़ी से चक्कर लगाना इनके नाम 'चकरी चिड़िया' के बिलकुल अनुकूल है। गर्मी के मौसम में इनके झुंड काफी नज़र आते हैं। चकरी चिड़िया को मौसमी चिड़िया भी माना जा सकता है। |
छोटी चिड़ियायह है इक छोटी सी चिड़िया।नाम है इसका गरवैया॥ घरों में घोंसला बनाती है। सुबह सवेरे दाना चुगने जाती है॥ कुछ खाती है, कुछ ले आती है। काम सब करती, बच्चों को खिलाती है॥ यह है इक छोटी सी चिड़िया। नाम है इसका गरवैया॥ चंचल है, फुर-फुर उड़ती जाती है। शाम ढ़ले डालों पर चहचहाती है॥ नद-नालों में पानी पीती, नहाती है। थके तो घोंसलों में सुस्ताती है॥ यह है इक छोटी सी चिड़िया। नाम है इसका गरवैया॥ |
लिसोड़े, गुल्लड़ और कदमलिसोड़े, गुल्लड़ और कदम वृक्षों के नाम हैं, या उमंग और उल्लास का ज्वलंत उदाहरण। या फिर स्वयं में एक पारिस्थितिकीय इकाई। ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ से ही इन वृक्षों पर पक्षियों का आना-जाना शुरू हो जाता है। छोटी- छोटी पत्तियों के कोपल डालियों पर आने लगते हैं और देखते ही देखते ये घने वृक्ष में बदल जाते हैं। पूरी गर्मी में तो ये इतने घने हो जाते हैं कि धूप की किरणें ज़मीन तक नहीं पहुंच पातीं। ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से अपने ऊपर निर्भर प्राणियों को बचाने के लिए ये पता नहीं किस-किस प्रकार का उपाय करते हैं। जितनी तेज़ सूरज की किरणें इनके पत्तियों पर पड़ती हैं, उतनी ही इनकी पत्तियाँ हरी और बड़ी होती जाती हैं। केवल इतना ही नहीं उतनी ही प्राण-दायक गैसें भी ये अपने आसपास के वातावरण में फैलाते रहते हैं। ठंडक का तो कहना ही नहीं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सूरज की गर्मी से लड़ रहे हों। गाँव-वालों और पथिकों के लिए तो ये धूप और वर्षा दोनों से बचने का प्राकृतिक साधन बन जाते हैं। चिड़ियों और कीट-पतंग सभी के लिए खाद्य पदार्थ की प्रचूर मात्रा इनके पास मौजूद रहती है। एक ऐसा स्थान जहाँ उनके सारे आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हो और जहाँ वो अपने सगे- संबंधियों तथा अन्य जीव जन्तुओं के बीच स्वच्छंद रूप से जीवन व्यतीत कर सकते हों। ये वृक्ष अपने आस-पास का तापमान भी इन जीव-जन्तुओं के अनुकूल बनाए रखते हैं। असल में ये केवल वृक्ष नहीं होते बल्कि लाखों प्राणियों क घर होते हैं। ये स्वयं तो फलते-फूलते हैं ही साथ ही साथ इन प्राणियों की रक्षा तथा इन्हें फलने-फूलने में मदद भी करते हैं। |
ज़मीन का अल्सरबूंदी, अरावली की पहाड़ियों में बसा एक छोटा सा गाँव था। कहीं ऊँट बाँ-बाँ करते बबूल की पत्तियों पर अपना मुंह मार रहे थे तो कहीं गाय-बैलों की भाँ-भाँ मची थी। खेतों से उठती रहट की चर्र-चर्र की आवाज़े दूर-दूर तक फैल रही थीं। किसान अपने खेतों में पानी पटा रहे थे।जमील भी इसी गाँव का एक किसान था। उसके पास इतनी ज़मीन थी कि वह मेहनत से खेती कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण आराम से कर लेता था। ज़मीन तो कम थी, किन्तु थी काफी उपजाऊ। ऊपर से जमील की मेहनत। परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा था। अचानक जमील की स्त्री बिमार रहने लगी। जमील ने उसे जगह- जगह जा कर वैद्यों से दिखलाया, किन्तु कोई लाभ न हुआ। जमील ने अपनी स्त्री के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सारा धन व्यय कर डाला। हालत खराब हो गई। आख़िर पता चला कि उसकी स्त्री को अल्सर है और औपरेशन कराना आवश्यक है। पैसे तो पहले ही ख़त्म हो चुके थे। थक हार कर वह अपनी ज़मीन के काग़ज़ात ले कर अपने गाँव के साहुकार के पास जा पहुंचा और बोला,"साहुकार जी, मुझे २५०० रूपयों की आवश्यकता है। मेरी स्त्री बिमार है और औपरेशन होना है। आप मुझे कुछ दिनों के लिए ये पैसे दे दें तो बड़ी मेहरबानी होगी। साहुकार ने पहले जमील की बात सुनी और फिर गम्भीर मुद्रा में बोला,"अरे ले जाओ, मैं किस लिए हूँ। चूंकि तुम आदमी भले हो और परिवार के सदस्य की तरह से हो इसलिए व्याज तुमसे केवल एक रूपए प्रति माह के दर से लुंगा।" साहुकार का मुनीम गल्ले पर बैठा बातें सुन रहा था। साहुकार ने मुनीम से कहा कि ज़मीन के काग़ज़ात ले ले और जमील का अंगुठा लगवा कर पैसे उसे दे दे। मुनीम ने वैसा ही किया। जमील ने साहुकार का आभार प्रकट किया और नमस्कार कर वहाँ से चला गया। उसके जाने के बाद मुनीम ने साहुकार से पूछा,"आपने उसे इतने कम दर पर पैसा क्यों दे दिया?" साहुकार ने कहा, "अरे मुर्ख ये किसान चिंदी का मतलब नहीं समझते। तू जा अपना काम कर।" जमील ने उन पैसों से अपनी स्त्री का औपरेशन करवाया और वह ठीक हो गई। पर जमील को क्या पता था कि अनजाने में उसने अपनी ज़मीन को बिमार कर दिया है और शायद उसकी ज़मीन इस अल्सर की बिमारी से न उभर पाए। |
 
 
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© 2007 Syed Ghalib Hussain | | Contact | | Last Updated: 10-09-2009 |
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